लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस द्वारा डिजिटल अरेस्ट ठगी गिरोह की गिरफ्तारी
लखनऊ
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में साइबर क्राइम पुलिस ने एक बड़े और संगठित साइबर ठगी गिरोह का खुलासा करते हुए फर्जी पुलिस अधिकारी बनकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ की साजिश रचने वाले चार शातिर अभियुक्तों को गिरफ्तार किया है। यह गिरोह खुद को पुलिस, एनआईए और एटीएस जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराता था और मानसिक दबाव बनाकर लाखों रुपये की ठगी करता था। पुलिस जांच में सामने आया है कि इस गिरोह ने एक सेवानिवृत्त राजकीय पेंशनर से 54 लाख 60 हजार रुपये की साइबर ठगी की थी।
कैसे हुआ ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल
साइबर क्राइम पुलिस के अनुसार पीड़ित राजेन्द्र प्रकाश वर्मा को 13 दिसंबर 2025 को एक व्हाट्सएप वीडियो कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वालों ने खुद को पुलिस इंस्पेक्टर और एनआईए/एटीएस का अधिकारी बताते हुए गंभीर आरोप लगाए। ठगों ने पीड़ित को यह कहकर डराया कि उसके बैंक खातों का इस्तेमाल आतंकी फंडिंग और फर्जी लेन-देन में किया गया है, जिसमें लगभग सात करोड़ रुपये का अवैध ट्रांजैक्शन हुआ है।
इसके बाद पीड़ित को तथाकथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ की बात कहकर लगातार ऑनलाइन निगरानी में होने का डर दिखाया गया। ठगों ने कहा कि यदि वह सहयोग नहीं करेगा तो उसकी गिरफ्तारी हो सकती है और उसकी पेंशन भी बंद कर दी जाएगी। भय और मानसिक दबाव में आकर पीड़ित ने जांच और वेरिफिकेशन के नाम पर अपने एसबीआई खाते से दो अलग-अलग बैंक खातों में कुल 54 लाख 60 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए।
‘डिजिटल अरेस्ट’ नाम का कोई कानून नहीं
पुलिस ने स्पष्ट किया है कि भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई भी कानूनी प्रावधान नहीं है। यह पूरी तरह से साइबर ठगों द्वारा गढ़ी गई एक फर्जी अवधारणा है, जिसका उद्देश्य आम नागरिकों को डराकर ठगी करना है। अक्सर ठग सरकारी वर्दी, फर्जी आईडी कार्ड और वीडियो कॉल का इस्तेमाल कर लोगों को भ्रमित करते हैं।
साइबर क्राइम पुलिस की कार्रवाई
घटना की गंभीरता को देखते हुए साइबर क्राइम थाना लखनऊ में अपराध संख्या 207/2025 के तहत भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66डी में मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस आयुक्त लखनऊ के निर्देशन और वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में एक विशेष जांच टीम गठित की गई।
टीम ने तकनीकी साक्ष्यों, बैंक ट्रांजैक्शन डिटेल्स, मोबाइल लोकेशन और डिजिटल फुटप्रिंट के आधार पर जांच करते हुए गिरोह के सदस्यों तक पहुंच बनाई और चार अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया।
गिरोह का काम करने का तरीका
पूछताछ में अभियुक्तों ने स्वीकार किया कि वे एक संगठित साइबर ठग गिरोह के रूप में कार्य करते थे। गिरोह का एक हिस्सा वीडियो कॉल के जरिए खुद को पुलिस या केंद्रीय एजेंसी का अधिकारी बताकर लोगों को डराने का काम करता था। वहीं दूसरा हिस्सा ऐसे गरीब और अनपढ़ लोगों को निशाना बनाता था, जिन्हें लोन या अन्य लालच देकर उनके बैंक खाते, एटीएम कार्ड और चेकबुक हासिल कर लिए जाते थे।
इन खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। ठगी की रकम पहले इन खातों में डाली जाती थी और फिर कमीशन काटकर नकद, चेक या ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के जरिए अन्य खातों में भेज दी जाती थी ताकि रकम की ट्रेसिंग मुश्किल हो सके।
अभियुक्तों की भूमिका
पुलिस जांच में सामने आया कि अभियुक्त आरिफ इकबाल खुद को लोन एजेंट बताकर लोगों से बैंक डिटेल्स और दस्तावेज हासिल करता था। अन्य अभियुक्त बैंक खातों की व्यवस्था, नकदी निकालने और रकम को आगे रूट करने का काम करते थे।
बरामदगी का विवरण
गिरफ्तार अभियुक्तों के कब्जे से पुलिस ने:
- ₹34,334 नकद
- 5 मोबाइल फोन
- 7 एटीएम कार्ड
- 1 पैन कार्ड
- 1 आधार कार्ड
- 3 फर्जी प्रेस आईडी कार्ड
- 2 चेक
बरामद किए हैं। इन सभी साक्ष्यों को पुलिस ने कब्जे में लेकर फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया है।
👥 गिरफ्तार अभियुक्त
गिरफ्तार किए गए अभियुक्तों के नाम:
- मो. सूफियान
- मो. आजम
- आरिफ इकबाल
- उजैर खान
पुलिस इन सभी के आपराधिक इतिहास की भी गहनता से जांच कर रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि इस गिरोह ने देश के अन्य हिस्सों में कितनी वारदातों को अंजाम दिया है।
पुलिस की जनता से अपील
साइबर क्राइम पुलिस ने आम जनता से अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल, वीडियो कॉल या मैसेज पर तुरंत भरोसा न करें। कोई भी पुलिस या जांच एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी की धमकी नहीं देती। अगर कोई व्यक्ति खुद को अधिकारी बताकर पैसे की मांग करता है तो तुरंत सतर्क हो जाएं।
साइबर ठगी की किसी भी घटना की सूचना तुरंत राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 या cybercrime.gov.in पर दर्ज कराएं।
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