अल्मोड़ा में उत्तर-पूर्वी किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण
उत्तर-पूर्वी किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों का प्रशिक्षण, आजीविका संवर्धन पर विशेष फोकस
अल्मोड़ा ।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (वीपीकेएएस), अल्मोड़ा में उत्तर-पूर्वी भारत से आए किसानों के लिए जलवायु-अनुकूल एवं टिकाऊ कृषि तकनीकों पर आधारित पाँच दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। यह प्रशिक्षण 27 जनवरी से 31 जनवरी 2026 तक चला, जिसमें उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विभिन्न राज्यों से आए 18 किसानों ने भाग लिया।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पर्वतीय और संवेदनशील जलवायु परिस्थितियों में टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, कृषि उत्पादन में वृद्धि करना तथा किसानों के लिए वैकल्पिक आजीविका के अवसर विकसित करना रहा।
पर्वतीय कृषि को सशक्त बनाने की दिशा में पहल
प्रशिक्षण कार्यक्रम विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया। इन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव तेजी से देखा जा रहा है, जिससे पारंपरिक खेती पर असर पड़ रहा है। ऐसे में किसानों को जलवायु-अनुकूल तकनीकों से जोड़ना समय की आवश्यकता बन गया है।
उद्घाटन सत्र में संस्थान की तकनीकों की जानकारी
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में संस्थान के प्रभारी निदेशक एवं फसल सुधार विभागाध्यक्ष एन. के. हेडाऊ ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की प्रमुख प्रौद्योगिकियों और उत्तर-पूर्वी हिमालयी कार्यक्रम की रूपरेखा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाना और खेती को टिकाऊ बनाना संस्थान की प्राथमिकता है।
मिलेट्स और वैकल्पिक फसलों पर विशेष सत्र
प्रशिक्षण के शुरुआती दिनों में मिलेट्स (श्रीअन्न) और अन्य संभावनाशील फसलों के उत्पादन पर विशेष चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि मिलेट्स न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रति अधिक सहनशील भी हैं। इसके साथ ही सब्जियों की संरक्षित खेती, उन्नत कृषि पद्धतियों और फसल विविधीकरण पर भी व्याख्यान आयोजित किए गए।
क्षेत्रीय भ्रमण से मिला व्यावहारिक अनुभव
29 जनवरी को प्रतिभागियों को दाड़िमा क्लस्टर और केंद्रीय समशीतोष्ण बागवानी संस्थान, मुक्तेश्वर का भ्रमण कराया गया। इस दौरान किसानों ने उन्नत बागवानी तकनीकों, फलों के उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन से जुड़ी आधुनिक विधियों को नजदीक से देखा। यह भ्रमण किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हुआ, क्योंकि उन्हें प्रयोगशाला से बाहर खेत-स्तर पर तकनीकों को समझने का अवसर मिला।
पशुपालन, कृषि यंत्रीकरण और मधुमक्खी पालन पर जोर
30 जनवरी को पर्वतीय कृषि प्रणाली में पशुपालन प्रबंधन, कृषि यंत्रीकरण, मक्का उत्पादन की आधुनिक तकनीक, जैव उर्वरकों और सूक्ष्मजीवी इनोकुलेंट्स के उपयोग पर विस्तृत सत्र आयोजित किए गए। इसके साथ ही मधुमक्खी पालन को एक लाभकारी उद्यम के रूप में अपनाने पर भी किसानों को जानकारी दी गई।
इसी दिन प्रतिभागियों को संस्थान की अभियांत्रिकी कार्यशाला का भ्रमण भी कराया गया, जहां उन्हें पर्वतीय क्षेत्रों के लिए विकसित कृषि उपकरणों की जानकारी दी गई।
किसानों से संवाद और फीडबैक
संस्थान के निदेशक लक्ष्मीकांत ने प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों से सीधे संवाद किया और उनके अनुभव तथा प्रतिक्रियाएँ जानीं। उन्होंने किसानों को प्रेरित किया कि वे प्रशिक्षण के दौरान अर्जित ज्ञान को अपने-अपने क्षेत्रों में साझा करें, ताकि अधिक से अधिक किसान इन तकनीकों से लाभान्वित हो सकें।
अंतिम दिन आधुनिक तकनीकों पर व्याख्यान
प्रशिक्षण के अंतिम दिन पर्वतीय पारिस्थितिकी के अनुरूप धान और दलहन उत्पादन तकनीक, समन्वित मृदा एवं जल प्रबंधन, कृषि में ड्रोन के उपयोग और जैविक खेती जैसे विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान दिए गए। किसानों को बताया गया कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
प्रमाण-पत्र वितरण के साथ कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम का समापन उत्तर-पूर्वी हिमालयी कार्यक्रम के नोडल अधिकारी आर. के. खुल्बे की उपस्थिति में प्रतिभागियों की प्रतिपुष्टि और प्रमाण-पत्र वितरण के साथ किया गया। प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण को उपयोगी और ज्ञानवर्धक बताते हुए भविष्य में भी ऐसे कार्यक्रमों की आवश्यकता पर जोर दिया।
वैज्ञानिकों की अहम भूमिका
पूरे प्रशिक्षण कार्यक्रम का सफल समन्वय संस्थान के वैज्ञानिक कामिनी बिष्ट, आर. पी. मीना, एम. एस. भिंडा और उत्कर्ष कुमार द्वारा किया गया। वैज्ञानिकों ने प्रत्येक सत्र में किसानों के प्रश्नों का समाधान कर उन्हें व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया।
उत्तर-पूर्वी किसानों के लिए नई राह
यह प्रशिक्षण कार्यक्रम उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के किसानों के लिए न केवल नई तकनीकों से परिचय का माध्यम बना, बल्कि उनकी आजीविका को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ। जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाकर किसान आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का बेहतर सामना कर सकेंगे।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा द्वारा आयोजित यह पाँच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम उत्तर-पूर्वी किसानों के लिए ज्ञान, नवाचार और आत्मनिर्भरता की दिशा में एक प्रभावी पहल रहा। ऐसे कार्यक्रम न केवल कृषि विकास को गति देते हैं, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
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